Sunday, March 10, 2024

कितना सही कितना दूर

 हमारी स्थिति ऐसी होती है कि जब कोई कहे ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या हमें बहुत रोमांचक लगता है. ऐसा लगा है हम नाव में और भवसागर पार हो रहा है. यह एक उच्चतम गति है कि हम इस भाव में स्थित हो जाएँ :- 

सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीत। अथ खलु क्रतुमयः पुरुषो यथाक्रतुरस्मिल्लोके पुरुषो भवति तथेतः प्रेत्य भवति स क्रतुं कुर्वीत॥ 


परंतु किसी धार्मिक पुरुषार्थ और बिना वैराग्य के ये मात्र सुंदर वाक्य लगेगा. मानो बिना षट् सम्पति पुष्ठ हुए या किसी शमशान वैराग्य के चपेट में आकर ऐसा सोच हम नाव से उतरें यह सोच कर कि भवसागर पार हो गया तो निश्चित ही हम डूब जायेंगे.


अब लगेगा ये कैसे पार होगा तो भगवान् की शरण में जाएँ और अभ्यास करें और प्रेरित करें खुद को इस संसार की नाश्वरता के प्रति 


असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् |

अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते||

 


 

कुमार्गी की पहचान

गरुड़ काकभुसुंडि जी के समक्ष आश्चर्य प्रकट करते हैं कि रावण जो इतना बलशाली है, जिसके डर से सुर असुर सब इतना भयभीत हैं कि न निशा (रात) में सो पाते हैं और न दिन में भरपेट भोजन खा पाते हैं,

 

जाकें डर सुर असुर डेराहीं। निसि न नीद दिन अन्न न खाहीं

(अरण्यकाण्ड)


उस रावण को वेश बदल कर भगवती सीता का हरण करने के लिए चोर के भांति आना पड़ा।  तुलसीदास जी इसको "भड़िहाई" ऐसा लिखते हैं।  गरुड़ जी कहते हैं,  जैसे कुत्ता सूना देख चुपके से बर्तनों - भांडों में मुँह डालते वक़्त चोर के भांति आस पास डर से देखता  और ताकता है, वैसे ही बलशाली दशानन  रावण भड़िहाईं (चोरी ) करता हुआ माँ सीता का हरण करने हेतु पंचवटी में प्रवेश करता है। 


सो दससीस स्वान की नाईं। इत उत चितइ चला भड़िहाईं 

(अरण्यकाण्ड)


 राक्षस होते हुए भी जो कुल परम्परा से न केवल ब्राह्मण वरन प्रकांड पंडित था, जिसमें अतुलनीय बल था, जिसने खेल खेल में हीं कुबेर को जीत लिया हो और जिसने अपने बन्दीखाने में लोकपाल तक को कैद कर रखा हो वही रावण जब पंचवटी के पवित्र आश्रम में चौरकर्म करता हुआ श्वान जैसे जान पड़ता हो, इस पर काकभुसुंडि जी , एक कुमार्गी , कुपंथी की मनोदशा का वर्णन करते हैं , जो बहुत ही सटीक है।  

वह उत्तर देते है 

इमि कुपंथ पग देत खगेसा। रह न तेज तन बुधि बल लेसा 

(अरण्यकाण्ड)


अर्थात, जो भी कुमार्ग पर पैर रखते है उसके शरीर का तेज, बुद्धि और बल का लेश मात्रा भी नहीं रहता।

विद्वता , बल चाहे कितना भी हो जब व्यक्ति कुपंथ की और बढ़ता, उसकी प्रवृत्ति स्वयं को जब गर्हित कार्य में नियोजित होती है तब सबसे पहले उसका विवेक नाश हो जाता है।  विवेकशून्यता उसे काम , क्रोध,  लोभ, मद,  मोह और  मात्सर्य  के अधीन कर देती है और अनिष्ठ को और प्रवृत कर देती हैं, चाहे फिर विद्वान दशानन रावण ही क्यों न हो ? देखो कैसे दसकंधर रावण को उनका ही छोटा भाई कुंभकर्ण बिलखकर बोलता है - अरे मूर्ख! जगज्जननी जानकी को हर लाकर अब कल्याण चाहता है? 


सुनि दसकंधर बचन तब कुंभकरन बिलखान।

जगदंबा हरि आनि अब सठ चाहत कल्यान॥

(लङ्काकांड)


रावण के आगे एक अदना सा राम दूत अंगद भी,  अतुलित बलशाली रावण को अपमानित कर देता है , 

रे त्रियचोर कुमारग गामी। खल मल रासि मंदमति कामी

(लङ्काकांड)


इस सब का अर्थ यह हुआ कि मार्यादा के विपरीत कुमार्ग पर रखा एक कदम भी अन्तःत नाश की और ले जाता है इसलिए हमें हमेशा प्रभु के स्मरण कर नीति और सदाचार का आश्रय और आलम्बन लेना चाहिए।  यश मानव जीवन की विभूति है।इसे क्यों गवांए?

इति श्री 








   

Friday, March 8, 2024

भरत चरित्र - १

 विरह भक्ति की प्रतिष्ठा है, भक्त जब अपने प्रियतम भगवान की प्रतीक्षा में जो आंसू बहाता है वही है पराकाष्ठा भक्ति की।

मीरा बाई के पदों में प्रभु से अलगाव की व्यथा, वियोग में भक्त की स्थिति स्पष्ठ कर देता है।
मीरा कहती हैं :दर्शन के बिना आँखें दुखने लगी हैं। मेरे प्रिय! जबसे तुम बिछुड़े हो, कभी चैन नहीं मिला। तुम्हारा नाम सुनकर दिल काँप उठता है और फ़रियाद मीठी लगती है। टकटकी बाँधे तुम्हारी राह देख रही हूँ। वियोग की रात सबसे लंबी होती है। मेरी सजनी! आख़िर विरह का दु:ख किसको सुनाऊँ? मीरा के प्रभु कब मिलोगे? कब दु:ख मिटाओगे और कब सुख दोगे!

दरस बिन दूखन लागे नैन।
जब तें तुम बिछुरे पिव प्यारे, कबहुँ न पायो चैन॥
सबद सुनत मेरी छतियाँ काँपै, मीठे लागें बैन।
एक टकटकी पंथ निहारूँ भई छंमासी रैन॥
बिरह बिथा कासों कहुँ सजनी, बह गई करवत ऐन।
मीरां के प्रभु कबहो मिलोगे, दुःख मेटन सुख दैन॥
(मीरा माधव)

विरह अंत: करण का विशुद्ध भाव है।  विह्वल हृदय का क्रंदन सदा निर्मल और करुण होता है। अपने आराध्य से विरह की तड़प क्या न करवा देती है , यह भरत के शब्दों से ज्ञात हो जाता है।  जब भरत जी को भान होता है कि राम सीता और लक्ष्मण संग १४ वर्ष के वनवास पर चले गए।  उनको विश्वास न हुआ, मानो उनका सारा शरीर निर्जीव हो गया।  जब चेतना लौटी,  व्यथित हो जमीन पर गिरे और माँ कैकेयी को बहुत कठोर शब्दों से  धिक्कार दिया :

जननी मैं न जीऊँ बिन राम,
राम लखन सिया वन को सिधाये गमन,
पिता राउ गये सुर धाम,
जननी मैं न जीऊँ बिन राम।

कुटिल कुबुद्धि कैकेय नंदिनि,
बसिये न वाके ग्राम,
जननी मैं न जीऊँ बिन राम।।
(विनय पत्रिका)

श्री भरत जी राम विरह भक्ति के परम आचार्य हैं।भागवत में जो गोपियों का भाव है, बिल्कुल वही श्री भरत जी का है।
जहाँ गोपियों ने उद्धव को भ्रमर कह कटाक्ष किया वहीं भरत राम वियोग में बेसुद्ध हो अपनी जननी को भला बुरा कह देते हैं।  

भक्त अपने प्रभु की भक्ति में सदैव एकाकार रहता है, उनका अलगाव उसे उद्विग्न कर देता है , भला शब्दों की सीमा कहाँ बांधेगी इस असीम विरह वेदना को।  

 जो राम ने ठुकरा दिया वह भला भरत कहाँ स्वीकारते। अपने आराध्य से दूरी भरत को कहाँ रास आती। बिना रथ पर आरूढ़ हो जब नंगे पैर भरत राम से मिले, तब उनके कोमल पैर में छाले हो गए।  यह छाले उनके चरणों में कैसे चमकते हैं, जैसे कमल की कली पर ओस की बूँदें चमकती हों।

झलका झलकत पायन्ह कैसें। पंकज कोस ओस कन जैसें॥
भरत पयादेहिं आए आजू। भयउ दुखित सुनि सकल समाजू॥

भला इससे सुन्दर और क्या अभिव्यक्ति होगी प्रेम की। आराध्य के प्रति निश्छल, अनन्य, निस्वार्थ और प्रगाढ़ प्रेम इससे अधिक और क्या होगा ?

प्रेम अमृत है, विरह मंदराचल पर्वत है, भरतजी गहरे समुद्र हैं। कृपा के समुद्र श्री रामचन्द्रजी ने देवता और साधुओं के हित के लिए स्वयं (इस भरत रूपी गहरे समुद्र को अपने विरह रूपी मंदराचल से) मथकर यह प्रेम रूपी अमृत प्रकट किया है॥

प्रेम अमिअ मंदरु बिरहु भरत पयोधि गँभीर।
मथि प्रकटेउ सुर साधु हित कृपासिंधु रघुबीर।।




Thursday, February 29, 2024

अद्भुत ब्रह्म

बचपन में मैंने जब प्रथम बार तुलसीदास जी का जीवन परिचय पढ़ा , तब लगा था कि ईश्वर का खेल कितना निराला है।  परोक्ष रूप में वह किस प्रकार अपने प्रयोजन को अभिव्यक्त कर देता।  

राम स्वयं ब्रह्म हैं उनकी लीला वही जानें।  योगीजन की चेतना जिस नाम से शाश्वत आनंद में आनंदित होते हैं उस परम ब्रह्म को शब्द रूप  में राम कहा गया है।


रमन्ते योगिनोयस्मिन नित्यानन्दे सीदात्मनि |

इति राम पदेनसौ परम ब्रह्मभिधीयते ||

(श्री राम पूर्वतापनीय उपनिषद)


परब्रह्म अनंत, अथाह, शाश्वत और आनंद स्वरुप है ।  मोह रुपी अंधकार से निवृत्ति का एक ही मार्ग है उस परमब्रह्म की शरणागति। 


तुलसीदास जी के मोह त्याग का प्रसंग हमें ईश्वर की अनुपम लीला का दर्शन करता है। तुलसीदास जी का विवाह रत्नावली जी से हुआ था।  

विवाह के पश्चात, पुत्र तारक की मृत्यु के उपरान्त तुलसीदास जी  की अपनी पत्नी में आसक्ति और तीव्र हो गयी। दुःख से पीड़ित तुलसीदास जी जब पत्नी वियोग में  मोटी रस्सी से चढ़कर उनके कमरे में आये।  यह रस्सी नहीं अपितु सर्प था ऐसा जान रत्नावली जी ने तुलसीदास जी से कहा “ये मेरा शरीर जो मांस और हड्डियों से बना है। जितना मोह आप मेरे साथ रख रहे हैं अगर उतना ध्यान भगवान राम पर देंगे तो आप संसार की मोह माया को छोड़ अमरता और शाश्वत आनंद प्राप्त करेंगे।" 


तुलसीदास जी का  आध्यात्मिक जीवन का मार्ग यहीं से प्रशस्त हुआ।  इसके उपरान्त  तुलसीदास जी घर छोड़कर तपस्वी बन गए। पति+नी (नी+क्विप्)=पतिनि शब्द का  अपभ्रंश है, पत्नी। नी का अर्थ है, पथ प्रदर्शक अग्रणी आगे- आगे चलने वाला।इसी प्रकार पतिनी का अर्थ है- पति को साथ लेकर धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति में उसके आगे आगे चलने वाली स्त्री। वास्तव में रत्नावली जी के जिह्वा पर सरस्वती का वास था।  हमारे दर्शन में हर स्त्री में शक्ति (देवी) भाव को देखा गया है।  देवी ही माया हैं वही भ्रान्ति भी हैं और वही बुद्धि है और ज्ञान रुपी शान्ति भी हैं : 


या देवी सर्वभूतेषु माया रूपेण संस्थिता।

या देवी सर्वभूतेषु भ्रान्ति रूपेण संस्थिता।

या देवी सर्वभूतेषु शांति रूपेण संस्थिता।

या देवी सर्वभूतेषु बुद्धि रूपेण संस्थिता।

  

वस्तुतः शक्ति सर्वत्र व्यापत हैं : 


इन्द्रियाणामधिष्ठात्री भूतानां चाखिलेषु या| भूतेषु सततं तस्यै व्याप्तिदेव्यै नमो नमः। 


कितनी अनोखी बात है , तुलसीदास जी ने वेदांग वेदांत सब पढ़ा, परन्तु रज्जु सर्प न्याय, उन्हें इस तरह ईश्वर करा देंगे यह बहुत विस्मयकारी है।ब्रह्म अनिर्वचनीय है , बुद्धि के परे हैं। 

इस दिन के उपरान्त तुलसीदास जी की दिशा केवल राम शरणागति ही हो गयी।  पर राम परात्पर ब्रह्म हैं , दयालु हैं| राम भक्तवत्सल हैं , शरणागत की रक्षा करने वाले हैं  |अपने भक्त तुलसीदास को दर्शन दिए भक्त का मान भी रखा, 


चित्रकूट के घाट पर, भइ सन्तन की भीर।

तुलसिदास चन्दन घिसें, तिलक देत रघुबीर॥






     


Wednesday, April 1, 2020

सुमन

सुमन

मैंने ईश्वर से पूछा इक रात , निष्ठुर है क्यों तेरा न्याय 
निर्जन हुआ बसंत , बिना  'सुमन' कैसे हम बताएं ?
प्रेम करुणा सरलता की थी  'सुमन '  पर्याय ,
कुछ बातें अधूरी रह  गयीं ,कैसे कहाँ पहुंचाएं ?

अब  अधूरे शब्द हैं कुछ ,निर्वात सा  पसरा है मौन ,
स्नेह, ममत्व, निश्छल  प्रेम की धारा बहाये  कौन ?

कुछ निष्प्राण  शब्दों को पिरो कविता बनाये कौन ,
जो सुनता था , उल्लास से , अब है  वहां कैद मौन ?

करुण क्रंदन ,न प्रार्थना का है कोई न्याय ,
कर्म बड़ा ,या ,प्रारब्ध  बड़ा कोई यह  बतलाये 

तर्क वितर्क के बीच  ,सहसा मुस्काती माँ दिखी , 
आभा फैली मन में ,बही पवन स्नेहिल स्पर्श सी 

है प्रेम इतना प्रगाढ़ बोली ,लौटेंगे फिर रंग ,
'सुमन' बन फिर  लौट आउंगी मैं तुम्हारे अंक | 


Sunday, May 19, 2019

The Study - My School !

ईंटो  क़े ढाँचे से रिश्ता है पुराना ,
नादान ख्वाहिशों का शहर था अनजाना ।

पापा की उँगलियों को छोड़ लांघी जब इसकी दहलीज़।
छोटे से हाथों से थामी टीचर की कमीज़ ।

अनजानों की दुनिया लगी थी तब ,
कुछ नन्हे से औरों को देखा था  जब ।

यूँ सीमित था , तब रिश्तों का ज्ञान ,
ये अनजाने बनेंगे अपने ,नहीं था भान ।

जाने कब यारी ली सीख हमने ,
हंसी- ठहाकों से बातें लगी जमने ।

टीचर की डांट लगा करती  थी बुरी ,
कोमल सा मन फिर भी नहीं बनाता था दूरी ।

टीचर के मन जगह बनाना ,
उनके स्नेह के काबिल बन जाना ।

जब कोई कह देता था बातें चुभने वाली ,
रूठ के बैठ जाया करते थे खाली ।

फिर हंसी में,  रूठे मन में बहार आ जाना ,
घुल मिल के सबमें,फिर  खुश हो जाना ।

सोचता हूँ भूल आया हूँ खुद को उस गैलरी में,
जहाँ हँसा था मेरा बचपन ,
 जहाँ कैशोर  ने  झाँका था मुझ में ।

एक दूर मैदान में छोड़ आया खून पसीने के बूँद
सोचता हूँ कभी समेट आऊँ उस मिट्टी को जहाँ छोड़ आया सब कुछ....




















Saturday, June 17, 2017

पिता

आकाश सा विस्तृत होता ,वात्सल्य पिता का ।
जीवन के संघर्षों से लड़ ,फिर मुसकाता,जीवट पिता का ।
पेड़ की छाँव  सा ,प्रेमाश्रय पिता का ।
रात को जागकर ,चादर ओढ़ाता ,अनुराग पिता का ।

सब का सहारा बन ,मुस्कुराता ,श्रम पिता का ।
धूप में रहकर ,एक ,आशियां का ख्वाब सजाता  ,प्यार पिता का ।
भूखा होकर ,एक रोटी ,भी ,आधी -आधी करता वात्सल्य पिता का ।
हर रोज़ सुबह , पीठ पर थपथपाता  ,स्नेह पिता का ।

ऊँगली पकड़ कर ,स्कूल  छोड़ आता ,जिगरा पिता का ,
फिर चुपके से देख ,आंसू छुपाता , प्यार पिता का ।
पहली साइकिल की सवारी, होती दिलेरी पिता की ।
डगमगाते ,पर गिरने न देती ,चेतना पिता की ।

कभी ठोकर खा भी जाएँ , तब , राहत सा आगोश पिता का ।
कभी पीठ ,कभी गोद ,में गुनगुनाता प्यार पिता का ।
कभी कठोर कभी नर्म ,धूप -छाँव सा प्यार पिता का ।
सौम्य  मर्म को न दिखलाए ,ऐसा अद्भुत , स्नेह  पिता का ।।