Monday, April 20, 2026

कूलस्था

 

जगदम्बा पराम्बा के आशीष से फिर जीवंत हो जाना, 

भगवती लक्ष्मी जैसे हुईं थीं बद्री, कुटुंब के रक्षण को अब बेटी बन  आना !

हमारे उर में व्याप्त तुम सुमन सी, अब उस कन्या में समा जाना! 


मीन अक्ष, स्मित मुख, नए कलेवर से फिर बगिया को महकाना 

अक्तूबर में झरते हरसिंगार के फूल तुम फिर, 

छोटे-छोटे हाथों  से अब अर्चन के लिए चुन लाना! 


पुन : ममत्व से कोमल, नन्हें पैर रखती चली आना, 

पूर्व जन्म के तप से हर कोने को प्रदीप्त कर जाना,

निज भवन में नव पुष्प सी सुरभि बन तुम बस जाना ! 



बीच आँगन बना अल्पना, स्फूर्त सृजन से रंग लाना, 

सूखे पत्ते सिमट गए अब, शैशव की हरीतिमा तुम फैलाना,

निश्चल मुस्कान, चंचल किलकारी, से शून्य को गुंजायमान कर आना! 


अपने संस्कारों के अंकुर को, पितृत्व का सौभाग्य दिलाना,

अज्ञान तिमिर मिटा, ज्ञान से सुदीप्त दिशा दिखाना, 

घुटनों घुटनों चल इस घर में पुष्टिवर्धन का संचार तुम भर जाना! 



संज्ञा क्या होगी इस सुन्दर भाव की, यह भी अब तुम बतलाना, 

बाबा की आद्या,बुआ की कुहू,  माँ बाप की कृष्णप्रिया, दुलार से कुमुद, 

इस पुनर्जन्म में, हमारे जीवन की आह्लाद बन, कूलस्था तुम कहलाना ...






Saturday, March 16, 2024

सूर परिचय -१





 राधा रानी वृंदावन की अधिष्ठात्री देवी हैं | श्री राधा भगवान कृष्ण की आह्लादिनी शक्ति हैं | उन्हें प्रेम की देवी कहा जाता है। ब्रज भूमि की आत्मा के रूप में ब्रजवासी उन्हें प्यार करते हैं |राधा की महिमा को बताते हुए ब्रज के संत कहते हैं कि, "कोटिन रूप धरे नंदनंदन, तो भी न पायो पार" |श्री राधा और कृष्ण एक ही तत्व के दो रूप हैं | ब्रज भूमि संतों की, रसिकों की, कवियों की भूमि हैं।  अष्टछाप कवियों में सभी एक से बड़ कर एक हैं परन्तु सूरदास जी एक विशेष ही स्थान है ! सूर सगुन भक्ति और राधा कृष्णा उपासना के पुरोधा हैं।  सूर दास जी वल्लभाचार्य जी के पुष्टिमार्गी संत थे।  प्रेमतत्व और वियोग वेदना से भरे उनके पद मानो तीर जैसे लगते हैं चेतना पर। 
एक बार तानसेन जी ने कहा कि जब किसी  तड़पते हुए व्यक्ति को देखता हूँ, तो लगता है कि शायद इसे किसी शूर (योद्धा) का बाण लग गया है अथवा इसे उदर-सूर (शूल) की बीमारी हो गई है या फिर निश्चित ही सूर का कोई पद इसके लग गया है। इसी कारण यह व्यक्ति तड़प रहा है।

किधौं  सूर  कौ  सर लग्यौ,  किधौं सूर की पीर ।
किधौं सूर को  पद लग्यौ,  तन मन धुनत सरीर ।। 

वल्लभाचार्य जी विशुद्ध अद्वैत और पुष्टिमार्गी सम्प्रदाय के संस्थापक थे।  सूर दास पहले काफी दास्य भाव में पद लिखते थे। वल्लभाचार्य से पुष्टिमार्ग में दीक्षित होने के बाद उन्होंने वात्सल्य माधुर्य और विरह  को बहुत ही भावपूर्ण रूप में प्रस्तुत किया। गुरु की महिमा अनुपम  होती है वल्लभाचार्य के सान्निध्य में दास्य भाव को सख्य भाव में लिखने लगे।  कृष्ण की माखनचोरी हो या गोचारण हो यह उनकी नटखट बाल लीलाएं   , सूरदास ने अपने पदों से मानों सब जीवंत कर दिया।  उनको पढ़के ऐसा प्रतीत होता है मानो सूर साक्षी रूप में सदा कृष्ण के साथ रहे हों।  
राधा कृष्णा प्रसंग में कृष्ण को परमब्रह्म मान और राधा  उनकी माया इस रूप में मान कर उन्होंने बहुत ही सुन्दर काव्य पिरोये।  माया -ब्रह्म की अलौकिक क्रीड़ा को उनसे अधिक भक्तिपूर्ण तरीके से कोई और समझा पाया भला ? 
सूरदासजी को भक्तिमार्ग का सूर्य कहा जाता है। जिस प्रकार सूर्य एक ही है और अपने प्रकाश और उष्मा से संसार को जीवन प्रदान करता है उसी तरह सूरदासजी ने अपनी भक्ति रचनाओं से मनुष्यों में भक्तिभाव का संचार किया। सूरदासजी जन्मांध थे परन्तु मन की आंखों से भगवान् के श्रृंगार और लीलाओं के दर्शन की उनकी अनोखी सिद्धि थी। 

सूरदास जी के जीवन से एक प्रसंग बहुत ही मार्मिक है।  सूरदास नवनीत प्रिय का दर्शन करने गोकुल जाते थे और श्रृंगार का ज्यों-का त्यों वर्णन कर दिया करते थे। एक बार गोसाईं विठलनाथ के पुत्र गोकुलनाथ ने परीक्षा लेनी चाही और कान्हा को मात्र मोतियों की माला ही पहनाई और कोई श्रृंगार और वस्त्र न पहनाया। जो कृष्ण का भक्त हो उसे कहाँ , किन्ही आखों की ज़रूरत जिनके मर्म में हो कन्हैया लाल ऐसे सूरदास जी ने तुरंत लिख दिया : 

देखे री हरि नंगम नंगा।
जलसुत भूषन अंग बिराजत, बसन हीन छबि उठत तरंगा।।
अंग अंग प्रति अमित माधुरी, निरखि लजित रति कोटि अनंगा।
किलकत दधिसुत मुख ले मन भरि, सूर हँसत ब्रज जुवतिन संगा।।
.देखे री हरि नंगम नंगा।


 
 
 

 

Friday, March 15, 2024

शैव अद्वैत भूमिका - ६ (जीवन्मुक्ति)


 


अद्वैतवादी मानते हैं कि जीवन्मुक्त की अवस्था आने के पश्चात व्यक्ति केवल प्रारब्ध के कर्म क्षय तक संसार में जीता है।  न कोई रूचि न लगाव न कोई सांसारिक प्रयोजन होता है।  उसमें कोई क्रिया नहीं होती वह सांसरिक निष्क्रिय हो जाता है। काश्मीर वेदांती मानते हैं कि जीवनमुक्ति पूर्ण सक्रियता की अवस्था है।  काश्मीर मत में क्रिया या स्पन्द आत्मिक है सो जीवन्मुक्त होने का अर्थ स्वाभाविक रूप से क्रियाशील हो जाना है।  वह सांसारिक कार्य करता है , पर लीला कार्य या स्पन्द कार्य है जैसे।  

काश्मीर मत कि ये विशेषता है कि आत्मा प्राप्ति या जीवनमुक्ति के उपरान्त भी आत्मा (जिसकी प्राप्ति जीवनमुक्ति के बाद हुई ) जगत से कटती (isolate) नहीं वरन जगत में समाहित होती हो जाती है।  जीवन मुक्त व्यक्ति जान लेता है सब में मैं और मुझमें सब हैं और सारा संसार मेरा ही वैभव है।  ईश्वरप्रत्यभिज्ञा दर्शिनी में अभिनवगुप्त कहते हैं : 

सर्वो ममायं विभव इत्येवं परिजानतः ।

विश्वात्मनो विकल्पानां प्रसरेऽपि महेशता॥


जीवन्मुक्त सारे संसार में एकत्व समझता है।  पूर्णतः विश्वप्रेम में रहता है।  जगत बंधन नहीं  बल्कि जगत को अपने से भिन्न समझना बंधन है। 

जीवन्मुक्त व्यक्ति  संसार के भोगों को भी अपने स्वरुप के लीला विलास के रूप में लेता है।  वह संसारिक भोगों में भी अपने स्वरुप को ही भोगता है।  जगत का आनंद उसका स्वरूपानंद का ही स्फुरण है।  भोगों को जब कामना की पूर्ति या स्वार्थपूर्ण प्राप्ति के लिए करते हैं तब बंधन है और जब भोग आनंद के स्पन्द के रूप में हो तब बंधन नहीं करता वरन आनंद उदात्त होता है।  भोग बंधन नहीं अपितु स्वार्थ और अहंकार है।  तंत्र इसे सूर्य और अग्नि  के दृष्टांत से समझाया गया है।  जैसे सूर्य सारी गन्दगी सोखकर भी और अग्नि सारी गंदगी जलाकर भी दूषित नहीं होते उसी प्रकार एक योगी ( जीवन्मुक्त) सभी भोगों को भोग कर भी पाप से निर्लिप्त रहता है: 


सर्वशोषी यथा सूर्यः सर्वभोगी यथाSनल:। 

योगी भुक्त्वाखिलान् भोगान् तथा पापैर्न लिप्यते।। 


(कुलार्णव तंत्र)