Monday, April 20, 2026

कूलस्था

 

जगदम्बा पराम्बा के आशीष से फिर जीवंत हो जाना, 

भगवती लक्ष्मी जैसे हुईं थीं बद्री, कुटुंब के रक्षण को अब बेटी बन  आना !

हमारे उर में व्याप्त तुम सुमन सी, अब उस कन्या में समा जाना! 


मीन अक्ष, स्मित मुख, नए कलेवर से फिर बगिया को महकाना 

अक्तूबर में झरते हरसिंगार के फूल तुम फिर, 

छोटे-छोटे हाथों  से अब अर्चन के लिए चुन लाना! 


पुन : ममत्व से कोमल, नन्हें पैर रखती चली आना, 

पूर्व जन्म के तप से हर कोने को प्रदीप्त कर जाना,

निज भवन में नव पुष्प सी सुरभि बन तुम बस जाना ! 



बीच आँगन बना अल्पना, स्फूर्त सृजन से रंग लाना, 

सूखे पत्ते सिमट गए अब, शैशव की हरीतिमा तुम फैलाना,

निश्चल मुस्कान, चंचल किलकारी, से शून्य को गुंजायमान कर आना! 


अपने संस्कारों के अंकुर को, पितृत्व का सौभाग्य दिलाना,

अज्ञान तिमिर मिटा, ज्ञान से सुदीप्त दिशा दिखाना, 

घुटनों घुटनों चल इस घर में पुष्टिवर्धन का संचार तुम भर जाना! 



संज्ञा क्या होगी इस सुन्दर भाव की, यह भी अब तुम बतलाना, 

बाबा की आद्या,बुआ की कुहू,  माँ बाप की कृष्णप्रिया, दुलार से कुमुद, 

इस पुनर्जन्म में, हमारे जीवन की आह्लाद बन, कूलस्था तुम कहलाना ...