Tuesday, March 12, 2024

शैव अद्वैत - १ (भूमिका)





इस श्रृंखला का उद्देश्य काश्मीर शैव दर्शन की जितनी मेरी समझ उसे मैं साझा करूँ।

सर्वप्रथम गुरु परंपरा को नमन

शंकरं शंकराचार्यं केशवं बादरायणम् ।
सूत्रभाष्यकृतौ बन्दे भगवन्तौ पुनः पुनः ॥



शंकराचार्य द्वारा प्रदत्त अद्वैत दर्शन मानता है ब्रह्म निष्क्रिय है, न भोक्ता है न कर्ता, वह सबसे परे हैं। भगवद्पाद आदि शंकराचार्य जी जब आठ वर्ष के थे तब संन्यास मार्ग में  प्रवृत हो गए थे। हिमालय  में शंकराचार्य जी से स्वामी गोविंदपाद जी मिले, तब उनसे पूछा, "तुम कौन हो ?"
तब बालक शंकराचार्य ने उत्तर दिया, न मैं मन हूं, न बुद्धि, न अहंकार, न ही चित्त, न कान, न जीभ, न नासिका, न ही नेत्र, न तो आकाश हूं, न धरती, न अग्नि, न ही वायु हूं। मैं न प्राण हूं, न ही पंच वायु हूं, मैं न सात धातु हूं, और न ही पांच कोश हूं। न मुझे घृणा है, न लगाव है, न मुझे लोभ है, और न मोह, न मुझे अभिमान है, न ईर्ष्या, मैं धर्म,धन, काम एवं मोक्ष से परे हूं। मैं पुण्य, पाप, सुख और दुख से विलग हूं, मैं न मंत्र हूं, न तीर्थ, न ज्ञान, न ही यज्ञ न मैं भोजन(भोगने की वस्‍तु) हूं, न ही भोग का अनुभव, और न ही भोक्ता हूँ।  न मुझे मृत्यु का डर है, न जाति का भेदभाव मेरा न कोई पिता है, न माता, न ही मैं कभी जन्मा था, मेरा न कोई भाई है, न मित्र, न गुरू, न शिष्य,मैं निर्विकल्प हूं, निराकार हूं, मैं चैतन्‍य के रूप में सब जगह व्‍याप्‍त हूं, सभी इन्द्रियों में हूं, न मुझे किसी चीज में आसक्ति है, न ही मैं उससे मुक्त हूं।  

मैं तो शुद्ध चेतना हूं, अनादि‍, अनंत शिव हूं।

मनोबुद्धयहंकारचित्तानि नाहम् न च श्रोत्र जिह्वे न च घ्राण नेत्रे
न च व्योम भूमिर्न तेजॊ न वायु: चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥1॥
न च प्राण संज्ञो न वै पञ्चवायु: न वा सप्तधातुर्न वा पञ्चकोश:
न वाक्पाणिपादौ  न चोपस्थपायू चिदानन्द रूप:शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥2॥
न मे द्वेष रागौ न मे लोभ मोहौ मदो नैव मे नैव मात्सर्य भाव:
न धर्मो न चार्थो न कामो ना मोक्ष: चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥3॥
न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दु:खम् न मन्त्रो न तीर्थं न वेदार् न यज्ञा:
अहं भोजनं नैव भोज्यं न भोक्ता चिदानन्द रूप:शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥4॥
न मे मृत्यु शंका न मे जातिभेद:पिता नैव मे नैव माता न जन्म:
न बन्धुर्न मित्रं गुरुर्नैव शिष्य: चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥5॥
अहं निर्विकल्पॊ निराकार रूपॊ विभुत्वाच्च सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम्
न चासंगतं नैव मुक्तिर्न मेय: चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥6॥

 
इस प्रकार वे नेति नेति द्वारा ब्रह्म को उद्घोषित कर देते हैं और जीव और ब्रह्म का एकत्व बता देते हैं।

शंकराचार्य निरालम्बोपनिषद (वेदान्तो नामोपनिषद् प्रमाणम्) से प्रमाण देते हैं और ब्रह्मज्ञान वल्ली माला में उद्धृत करते हैं कि  ब्रह्म वास्तविक है, ब्रह्मांड मिथ्या है । जीव ही ब्रह्म है और भिन्न नहीं। इसे सही शास्त्र के रूप में समझा जाना चाहिए। यह वेदांत द्वारा घोषित किया गया है।

ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः ।
अनेन वेद्यं सच्छास्त्रमिति वेदान्तडिण्डिमः ॥


एक जो भ्रम है : कि  अद्वैत का अर्थ ब्रह्म को पाना।  जो निष्क्रिय है , न भोक्ता है ऐसे में उसको पाना इसे समझ पाना बुद्धि से परे है। ब्रह्म को इसलिए अनिर्वचनीय बताया गया है और ब्रह्म को समझने के लिए उपनिषद्कार नेति नेति के तरीके को अपनाते हैं। यह समझना नितांत आवश्यक है कि अद्वैत का निष्कर्ष ब्रह्म को पाना नहीं परन्तु अविद्या (माया) को हटाना है।
 
ब्रह्म सर्वत्र व्यापत है : तस्य भासा इदं सर्वं भाति।  वस्तुतः ब्रह्म निष्क्रिय है और सारी सृष्टि माया है, यह अविद्या है जो आक्षिप्त है ब्रह्म पर।हमारा वास्तविक स्वरुप क्या है ? यह जानना अर्थात अविद्याकृत संसार के परदे को फाड़ फेंकना।  ब्रह्म तो पूर्व प्राप्त है , ज़रुरत है अविद्या के उन्मूलन की जो ज्ञान से प्राप्त हो पायेगा। शांकर अद्वैत दर्शन सुन्दर और अद्वितीय है परन्तु ब्रह्म को समझने का अद्वैत मार्ग काफी उदासीन बना देता है।   अद्वैत  मार्ग साधक को व्यक्तिवाद की पराकाष्ठा तक ले जाता है ।
 
यहाँ मेरा मत अद्वैत को अपूर्ण य काम आंकना नहीं है।  मैं एक अदना सा शोधार्थी हूँ।  जो यहाँ वहां मिलता है उसे संकलित कर अपने स्वान्तः सुखाय के लिख लेता और दार्शनिक  रसास्वादन करता हूँ। अद्वैत प्रवर्तक आदि शंकराचार्य स्वयं शिव ही हैं ऐसा सनातन धर्मावलम्बी मानते आये हैं : शंकरो शंकर: साक्षात्।  पर सत्य सहिष्णुता की पराकाष्ठा की स्वीकृति शनै: शनै: विकसित होती है और वह एकाएक किसी व्यक्ति के जीवन में उदित नहीं हो सकती ( पूरी पीठ जगद्गुरु निश्चलानंद सरस्वती )।  
 
यह स्वयं योगेश्वर श्री कृष्ण गीता जी में कहते हैं
शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया।
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत्।।
शनै: शनै: धैर्ययुक्त बुद्धि के द्वारा (योगी) उपरामता (शांति) को प्राप्त होती जब  मन को आत्मा में स्थित करके फिर अन्य कुछ भी चिन्तन न करें।  
 
 सभी पूर्वाचार्यों ने सही मायने में अद्वैत से मामूली सा अंतर कर अपना सिद्धांत प्रतिपादित किया  है।  काश्मीर वेदान्तियों का मत है जगत को सत्य मानकर भी अद्वैत की सिद्धि हो सकती है। 

काश्मीर शैव मत भी अद्वैतवादी है।  परन्तु यहाँ पूर्ण ब्रह्म शिव हैं।  यहाँ आगम को प्रमाण माना है इसलिए यह तांत्रिक मत है इसलिए काफी गोपनीय भी।  जहाँ अद्वैत एक निषेधात्मक दर्शन है और जगत को मिथ्या कहता है वहीँ कश्मीर शैव दर्शन ने जगत को मिथ्या नहीं बताया। यहाँ भोग और योग का प्रवृत्ति और निवृत्ति का समन्वय है।  यह जगत और जागतिक मूल्यों के प्रति भावात्मक दृष्टिकोण देता है।  

ऐसा बताया जाता है , स्वयं शिव भगवान् ने वसुगुप्त  को स्वपन में शिव सूत्र दिया जिस पर यह शैवाद्वैत टिका हुआ है। इसे त्रिक दर्शन कहा गया है और त्रिक शास्त्र हैं : सिद्धतन्त्र, मालिनीतंत्र और तंत्रागम (वामागम)।  काश्मीर शैवदर्शन में आचार्य अभिनवगुप्त को सर्वाधिक जाना जाता है।  वे बहुत ही सुन्दर काव्य के रचनाकार थे , उनके छन्द और रसों का प्रयोग उन्हें साहित्य में भी विशिष्ठ स्थान दिलाता है।  
उनका सब से सुन्दर ग्रन्थ तन्त्रालोक है। तन्त्रालोक में प्रत्यभिज्ञा दर्शन को महत्व दिया गया है |
  प्रत्यभिज्ञा (= प्रति + अभिज्ञा) का शाब्दिक अर्थ है- पहले से देखे हुए को पहचानना, या, पहले से देखी हुई वस्तु की तरह की कोई दूसरी वस्तु देखकर उसका ज्ञान प्राप्त करना। प्रत्यभिज्ञा का सरल अर्थ है : खुद को पहचानना। कहा गया है शिव स्पन्द शक्ति से युक्त हैं और वही उद्भव और प्रलय का कारण है।जहाँ अद्वैत में ब्रह्म को निष्क्रिय बताया है वहीँ कश्मीर शैव मत में शिव को स्पंदमान या क्रियाशील बताया है।  जैसे शांकर दर्शन में जीव और ब्रह्म में भेद नहीं उसी प्रकार यहाँ जीव और शिव में कोई अंतर नहीं हैं।  जीव तत्वतः  शिव ही है और शिव लीला कर जीव का रूप धारण करते हैं। जब अंधकार अज्ञान का हटता है तब साधक शिवोहम  शिवोहम ऐसा कह उठता है।  यहाँ शिव शक्ति और जीव का मिलन ही परम गति है।  
प्रत्यभिज्ञा दर्शन में शिव के दो रूप बताये गए : प्रकाश और विमर्श ।   प्रकाश की छाया ही विमर्श हैं : जहाँ शिव गौरवर्ण हैं सो प्रकाश स्वरुप वहीँ माँ काली विमर्श हैं।  जहाँ शिव चैतन्य स्वरुप हैं वहीँ काली अवचेतन (आत्मचेतन )हैं।  जब आत्मचेतना प्रस्फुटित होगी तब शिवत्व से एकाकार होगा । यहाँ उल्लेखनीय है कि शिव यहाँ स्पन्द शक्ति से युक्त हैं , इसलिए अद्वय तत्त्व होने पर भी इनमें आत्मचेतना है। तंत्र के अनुसार आत्मचेतना ( self consciousness ) चैतन्य (consciousness) का ही स्वरुप है।  प्रकाश तत्त्व को दर्पण की उपमा दी गयी है : जो शिव तत्त्व के सामने आता है वह उस से प्रकाशित हो जाएगा। प्रकाश और विमर्श की शक्तियों अर्थात शिव की पांच शक्तियों पर विचार अगली कड़ी में...............।  

(आगे आने वाली सारी पोस्ट की मुख्यतः  पाठ्य सामग्री हैं : काश्मीर शैव दर्शन , मूल सिद्धांत, कैलाश पति मिश्र )

Monday, March 11, 2024

त्वदीयं वस्तु गोविन्दम् तुभ्यमेव समर्पय!

 त्वदीयं वस्तु गोविन्दम् तुभ्यमेव समर्पय!

लगता है मानो जीवन विशाल सागर की भाँति है जिसमें क्षितिज का आभास तो है परन्तु किनारों का अभाव है इसी कारण उसके गर्भ में सदा ही काम , क्रोध , लोभ तथा मोह आदि विकारों की लहरें उठती रहती हैं तथा अनायास ही विध्वंस के लिए तत्पर रहती हैं | इन विनाशकारी लहरों पर विजय प्राप्त किए बिना ईश्वर  के प्रति स्वयं को समर्पित समझना , समर्पण जैसे भाव के प्रति अज्ञानता है! 


जहाँ सम्पूर्ण त्याग है वहीं समर्पण है |


प्रभु, इस सांसारिक जीव का मुक्ति की ओर बढ़ते पथ पर मिल जाए तुम्हारा आलंबन!

 


Sunday, March 10, 2024

भक्तवत्सल राम : जटायु के राम


जटायु ने  माँ सीता को बचाने के प्रयास में, रावण के शरीर को चोंच के प्रहार से विदीर्ण कर डाला। इस पर रावण ने  क्रोधयुक्त होकर अत्यन्त भयानक कटार निकाली और जटायु के पंख काट डाले। जटायु महाराज धरती पर आ गिरे और पूर्णकाम, आनंद,अजन्मा और अविनाशी  ब्रह्म को राम राम राम ऐसा कह कर स्मरण  करने लगे।  


पूरकनाम राम सुख रासी। मनुजचरित कर अज अबिनासी॥

आगें परा गीधपति देखा। सुमिरत राम चरन जिन्ह रेखा॥

(अरण्यकाण्ड)


भला भक्त कष्ट में हो और दीनदयाल प्रभु उनको अपना आश्रय न दें - ऐसा हो सकता है ? 


कोई भी हो, धर्म का काम ही क्यों न हो, दो कामनाएं (दो पक्ष  )अधिकतर मन में  रहती हैं : या तो धन की या प्रसिद्धि की।  जटायु महाराज के दो पंख को इस रूप में भी माना जा सकता हो ।  जो कोई धर्म के मार्ग पर बिना किसी आकांक्षा के प्रवृत होता है उसे प्रभु अवश्यमेव अपने श्री चरणों में स्थान देते हैं।  

कृपा के सागर भगवान, नीलाम्बुजश्यामलकोमलाङ्गं राम अपने कर कमलों से जटायु जी के सर पर हाथ फेरते हैं, 


कर सरोज सिर परसेउ कृपासिंधु रघुबीर

(अरण्यकाण्ड)


भक्त के सर पर भगवान का हाथ हो , फिर कहाँ वेदना टिके ? 

जटायु जी को मुनियों के मन को भी हर लेने वाले श्री रामजी का मुख देख अपनी पीड़ा का आभास न रहा 

निरखि राम छबि धाम मुख बिगत भई सब पीर

(अरण्यकाण्ड)


 गिद्ध माँसाहारी होते हैं और पक्षियों में सबसे अधम माने गए हैं। 

गीध अधम खग आमिष भोगी

(अरण्यकाण्ड)

 

परन्तु जटायु जी ने निष्पक्ष होकर स्वधर्म निभाते हुए अपने दोनों पक्षों को त्याग दिया  भला इससे ऊपर और क्या बलिदान होता ? भक्त वत्सल करुणामयी भगवान राम  ने अपनी गोद में जटायु जी को समेट लिया।  जिस गति की अभिलाषा योगी करते हैं वह आज गिद्ध महाराज जटायु जी को मिल रही थी , 


कोमल चित अति दीनदयाला। कारन बिनु रघुनाथ कृपाला॥

गीध अधम खग आमिष भोगी। गति दीन्ही जो जाचत जोगी॥

(अरण्यकाण्ड)

 


राम परम दयालु हैं अपने कमलनयन से झरते अश्रुओं से गोद में जटायु जी के घावों को सहलाया, जटायु जी के ऊपर धूल को अपनी जटाओं से साफ किया। 


गीध को गोद उठाये दयानिधि 

बारिद लोचन मैं बर भारी 

हाथ से पंख संभारत जात

जटायु की धूरि जटाओं से झारी।। 


भगवान राम कोमल हृदय हैं और जटायु जी से कहते हैं कि आप अपना शरीर बना के रखिये 

राम कहा तनु राखहु ताता। मुख मुसुकाइ कही तेहिं बाता

(अरण्यकाण्ड)

 

तब  जटायु जी प्रत्युत्तर देते हैं मरते  समय जिनका नाम मुख में आ जाने से अधम भी मुक्त हो जाता है

जाकर नाम मरत मुख आवा। अधमउ मुकुत होइ श्रुति गावा

(अरण्यकाण्ड)

 वह कहते हैं अब इस से ऊपर और क्या कामना हो जिसके लिए यह देह रहे  ? 

सो मम लोचन गोचर आगें। राखौं देह नाथ केहि खाँगें॥


भगवान भक्तों से प्रेम करते हैं भला उनको अपने धाम ले जाए बिना उन्हें चैन कहाँ ? और कृपा सिंधु राम कहते हैं जिनके मन में दूसरे का हित बसता है, उनके लिए जगत् में कुछ भी (कोई भी गति) दुर्लभ नहीं है। हे तात! शरीर छोड़कर आप मेरे परम धाम में जाइए। मैं आपको क्या दूँ? आप तो सब कुछ पा चुके हैं 


रहित बस जिन्ह के मन माहीं। तिन्ह कहुँ जग दुर्लभ कछु नाहीं॥

तनु तिज तात जाहु मम धामा। देउँ काह तुम्ह पूरनकामा॥

(अरण्यकाण्ड)

 



और जटायु जी भगवान राम की गोद में  अखंड भक्ति  का वर माँगकर अपना प्राण त्याग देते हैं और प्रभु राम उनके अंत्येष्टि  करते हैं ? यह हैं भक्त वत्सल राम 


बिरल भगति मागि बर गीध गयउ हरिधाम।

तेहि की क्रिया जथोचित निज कर कीन्ही राम।। 

(अरण्यकाण्ड)

 


और जैसा भगवान कृष्ण ने भगवद गीता में कहा 


अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम् |

य: प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशय: ||

(भगवद गीता)


अंत काल में जटायु जी ने सिर्फ एक राम नाम का आलम्बन लिया  और परम गति पायी , भगवान के आश्रय में जटायु ने  गिद्ध का देह त्याग दिया| हरि का रूप धारण कर अनुपम वस्त्र और आभूषण से सुशोभित हो कर परमधाम को प्रस्थान कर गए 


गीध देह तजि धरि हरि रूपा। भूषन बहु पट पीत अनूपा॥

स्याम गात बिसाल भुज चारी। अस्तुति करत नयन भरि बारी॥

(अरण्यकाण्ड)

 


कलियुग में केवल नाम ही आधार है, आइये राम नाम की महिमा गाते हैं  




शिव जी पार्वती  से कहते हैं कि  वे लोग अभागे हैं, जो भगवान् को छोड़कर विषयों से अनुराग करते हैं।

सुनहू उमा ते लोग अभागी। हरि तजि होहिं बिषय अनुरागी।


तुलसीदास जी सत्य ही कहा है कि जो राम नाम का सहारा लिए बिना ही परमार्थ और मोक्ष की आशा करता है, वह तो मानो बरसते हुए बादल की बूँदों को पकड़कर आकाश में चढ़ना चाहता है (अर्थात् जैसे वर्षा की बूँदों को पकड़कर आकाश पर चढ़ना असंभव है, वैसे ही राम नाम का जप किए बिना परमार्थ की प्राप्ति असंभव है)।


राम नाम अवलंब बिनु, परमारथ की आस। 

बरसत बारिद बूँद गहि, चाहत चढ़न अकास॥


माला लेकर किसी मंत्र-विशेष का जाप करने से तथा मस्तक एवं शरीर के अन्य अंगों पर तिलक-छापा लगाने से तो एक भी काम पूरा नहीं हो सकता, क्योंकि ये सब तो आडंबर मात्र हैं। कच्चे मन वाला तो व्यर्थ ही में नाचता रहता है, उससे राम प्रसन्न नहीं होते। राम तो सच्चे मन से भक्ति करने वाले व्यक्ति पर ही प्रसन्न होते हैं।


जपमाला छापैं तिलक, सरै न एकौ कामु। 

मन-काँचे नाचै वृथा, साँचै राँचै रामु॥ 


हृदय में निर्गुण ब्रह्म का ध्यान, नेत्रों के सामने सगुण स्वरूप की सुंदर झांकी और जीभ से सुंदर राम-नाम का जप करना। तुलसी कहते हैं कि यह ऐसा है मानो सोने की सुंदर डिबिया में मनोहर रत्न सुशोभित हो।


हियँ निर्गुन नयनन्हि सगुन, रसना राम सुनाम। 

मनहुँ पुरट संपुट लसत, तुलसी ललित ललाम॥ 


इति श्री 





कितना सही कितना दूर

 हमारी स्थिति ऐसी होती है कि जब कोई कहे ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या हमें बहुत रोमांचक लगता है. ऐसा लगा है हम नाव में और भवसागर पार हो रहा है. यह एक उच्चतम गति है कि हम इस भाव में स्थित हो जाएँ :- 

सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीत। अथ खलु क्रतुमयः पुरुषो यथाक्रतुरस्मिल्लोके पुरुषो भवति तथेतः प्रेत्य भवति स क्रतुं कुर्वीत॥ 


परंतु किसी धार्मिक पुरुषार्थ और बिना वैराग्य के ये मात्र सुंदर वाक्य लगेगा. मानो बिना षट् सम्पति पुष्ठ हुए या किसी शमशान वैराग्य के चपेट में आकर ऐसा सोच हम नाव से उतरें यह सोच कर कि भवसागर पार हो गया तो निश्चित ही हम डूब जायेंगे.


अब लगेगा ये कैसे पार होगा तो भगवान् की शरण में जाएँ और अभ्यास करें और प्रेरित करें खुद को इस संसार की नाश्वरता के प्रति 


असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् |

अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते||

 


 

कुमार्गी की पहचान

गरुड़ काकभुसुंडि जी के समक्ष आश्चर्य प्रकट करते हैं कि रावण जो इतना बलशाली है, जिसके डर से सुर असुर सब इतना भयभीत हैं कि न निशा (रात) में सो पाते हैं और न दिन में भरपेट भोजन खा पाते हैं,

 

जाकें डर सुर असुर डेराहीं। निसि न नीद दिन अन्न न खाहीं

(अरण्यकाण्ड)


उस रावण को वेश बदल कर भगवती सीता का हरण करने के लिए चोर के भांति आना पड़ा।  तुलसीदास जी इसको "भड़िहाई" ऐसा लिखते हैं।  गरुड़ जी कहते हैं,  जैसे कुत्ता सूना देख चुपके से बर्तनों - भांडों में मुँह डालते वक़्त चोर के भांति आस पास डर से देखता  और ताकता है, वैसे ही बलशाली दशानन  रावण भड़िहाईं (चोरी ) करता हुआ माँ सीता का हरण करने हेतु पंचवटी में प्रवेश करता है। 


सो दससीस स्वान की नाईं। इत उत चितइ चला भड़िहाईं 

(अरण्यकाण्ड)


 राक्षस होते हुए भी जो कुल परम्परा से न केवल ब्राह्मण वरन प्रकांड पंडित था, जिसमें अतुलनीय बल था, जिसने खेल खेल में हीं कुबेर को जीत लिया हो और जिसने अपने बन्दीखाने में लोकपाल तक को कैद कर रखा हो वही रावण जब पंचवटी के पवित्र आश्रम में चौरकर्म करता हुआ श्वान जैसे जान पड़ता हो, इस पर काकभुसुंडि जी , एक कुमार्गी , कुपंथी की मनोदशा का वर्णन करते हैं , जो बहुत ही सटीक है।  

वह उत्तर देते है 

इमि कुपंथ पग देत खगेसा। रह न तेज तन बुधि बल लेसा 

(अरण्यकाण्ड)


अर्थात, जो भी कुमार्ग पर पैर रखते है उसके शरीर का तेज, बुद्धि और बल का लेश मात्रा भी नहीं रहता।

विद्वता , बल चाहे कितना भी हो जब व्यक्ति कुपंथ की और बढ़ता, उसकी प्रवृत्ति स्वयं को जब गर्हित कार्य में नियोजित होती है तब सबसे पहले उसका विवेक नाश हो जाता है।  विवेकशून्यता उसे काम , क्रोध,  लोभ, मद,  मोह और  मात्सर्य  के अधीन कर देती है और अनिष्ठ को और प्रवृत कर देती हैं, चाहे फिर विद्वान दशानन रावण ही क्यों न हो ? देखो कैसे दसकंधर रावण को उनका ही छोटा भाई कुंभकर्ण बिलखकर बोलता है - अरे मूर्ख! जगज्जननी जानकी को हर लाकर अब कल्याण चाहता है? 


सुनि दसकंधर बचन तब कुंभकरन बिलखान।

जगदंबा हरि आनि अब सठ चाहत कल्यान॥

(लङ्काकांड)


रावण के आगे एक अदना सा राम दूत अंगद भी,  अतुलित बलशाली रावण को अपमानित कर देता है , 

रे त्रियचोर कुमारग गामी। खल मल रासि मंदमति कामी

(लङ्काकांड)


इस सब का अर्थ यह हुआ कि मार्यादा के विपरीत कुमार्ग पर रखा एक कदम भी अन्तःत नाश की और ले जाता है इसलिए हमें हमेशा प्रभु के स्मरण कर नीति और सदाचार का आश्रय और आलम्बन लेना चाहिए।  यश मानव जीवन की विभूति है।इसे क्यों गवांए?

इति श्री 








   

Friday, March 8, 2024

भरत चरित्र - १

 विरह भक्ति की प्रतिष्ठा है, भक्त जब अपने प्रियतम भगवान की प्रतीक्षा में जो आंसू बहाता है वही है पराकाष्ठा भक्ति की।

मीरा बाई के पदों में प्रभु से अलगाव की व्यथा, वियोग में भक्त की स्थिति स्पष्ठ कर देता है।
मीरा कहती हैं :दर्शन के बिना आँखें दुखने लगी हैं। मेरे प्रिय! जबसे तुम बिछुड़े हो, कभी चैन नहीं मिला। तुम्हारा नाम सुनकर दिल काँप उठता है और फ़रियाद मीठी लगती है। टकटकी बाँधे तुम्हारी राह देख रही हूँ। वियोग की रात सबसे लंबी होती है। मेरी सजनी! आख़िर विरह का दु:ख किसको सुनाऊँ? मीरा के प्रभु कब मिलोगे? कब दु:ख मिटाओगे और कब सुख दोगे!

दरस बिन दूखन लागे नैन।
जब तें तुम बिछुरे पिव प्यारे, कबहुँ न पायो चैन॥
सबद सुनत मेरी छतियाँ काँपै, मीठे लागें बैन।
एक टकटकी पंथ निहारूँ भई छंमासी रैन॥
बिरह बिथा कासों कहुँ सजनी, बह गई करवत ऐन।
मीरां के प्रभु कबहो मिलोगे, दुःख मेटन सुख दैन॥
(मीरा माधव)

विरह अंत: करण का विशुद्ध भाव है।  विह्वल हृदय का क्रंदन सदा निर्मल और करुण होता है। अपने आराध्य से विरह की तड़प क्या न करवा देती है , यह भरत के शब्दों से ज्ञात हो जाता है।  जब भरत जी को भान होता है कि राम सीता और लक्ष्मण संग १४ वर्ष के वनवास पर चले गए।  उनको विश्वास न हुआ, मानो उनका सारा शरीर निर्जीव हो गया।  जब चेतना लौटी,  व्यथित हो जमीन पर गिरे और माँ कैकेयी को बहुत कठोर शब्दों से  धिक्कार दिया :

जननी मैं न जीऊँ बिन राम,
राम लखन सिया वन को सिधाये गमन,
पिता राउ गये सुर धाम,
जननी मैं न जीऊँ बिन राम।

कुटिल कुबुद्धि कैकेय नंदिनि,
बसिये न वाके ग्राम,
जननी मैं न जीऊँ बिन राम।।
(विनय पत्रिका)

श्री भरत जी राम विरह भक्ति के परम आचार्य हैं।भागवत में जो गोपियों का भाव है, बिल्कुल वही श्री भरत जी का है।
जहाँ गोपियों ने उद्धव को भ्रमर कह कटाक्ष किया वहीं भरत राम वियोग में बेसुद्ध हो अपनी जननी को भला बुरा कह देते हैं।  

भक्त अपने प्रभु की भक्ति में सदैव एकाकार रहता है, उनका अलगाव उसे उद्विग्न कर देता है , भला शब्दों की सीमा कहाँ बांधेगी इस असीम विरह वेदना को।  

 जो राम ने ठुकरा दिया वह भला भरत कहाँ स्वीकारते। अपने आराध्य से दूरी भरत को कहाँ रास आती। बिना रथ पर आरूढ़ हो जब नंगे पैर भरत राम से मिले, तब उनके कोमल पैर में छाले हो गए।  यह छाले उनके चरणों में कैसे चमकते हैं, जैसे कमल की कली पर ओस की बूँदें चमकती हों।

झलका झलकत पायन्ह कैसें। पंकज कोस ओस कन जैसें॥
भरत पयादेहिं आए आजू। भयउ दुखित सुनि सकल समाजू॥

भला इससे सुन्दर और क्या अभिव्यक्ति होगी प्रेम की। आराध्य के प्रति निश्छल, अनन्य, निस्वार्थ और प्रगाढ़ प्रेम इससे अधिक और क्या होगा ?

प्रेम अमृत है, विरह मंदराचल पर्वत है, भरतजी गहरे समुद्र हैं। कृपा के समुद्र श्री रामचन्द्रजी ने देवता और साधुओं के हित के लिए स्वयं (इस भरत रूपी गहरे समुद्र को अपने विरह रूपी मंदराचल से) मथकर यह प्रेम रूपी अमृत प्रकट किया है॥

प्रेम अमिअ मंदरु बिरहु भरत पयोधि गँभीर।
मथि प्रकटेउ सुर साधु हित कृपासिंधु रघुबीर।।




Thursday, February 29, 2024

अद्भुत ब्रह्म

बचपन में मैंने जब प्रथम बार तुलसीदास जी का जीवन परिचय पढ़ा , तब लगा था कि ईश्वर का खेल कितना निराला है।  परोक्ष रूप में वह किस प्रकार अपने प्रयोजन को अभिव्यक्त कर देता।  

राम स्वयं ब्रह्म हैं उनकी लीला वही जानें।  योगीजन की चेतना जिस नाम से शाश्वत आनंद में आनंदित होते हैं उस परम ब्रह्म को शब्द रूप  में राम कहा गया है।


रमन्ते योगिनोयस्मिन नित्यानन्दे सीदात्मनि |

इति राम पदेनसौ परम ब्रह्मभिधीयते ||

(श्री राम पूर्वतापनीय उपनिषद)


परब्रह्म अनंत, अथाह, शाश्वत और आनंद स्वरुप है ।  मोह रुपी अंधकार से निवृत्ति का एक ही मार्ग है उस परमब्रह्म की शरणागति। 


तुलसीदास जी के मोह त्याग का प्रसंग हमें ईश्वर की अनुपम लीला का दर्शन करता है। तुलसीदास जी का विवाह रत्नावली जी से हुआ था।  

विवाह के पश्चात, पुत्र तारक की मृत्यु के उपरान्त तुलसीदास जी  की अपनी पत्नी में आसक्ति और तीव्र हो गयी। दुःख से पीड़ित तुलसीदास जी जब पत्नी वियोग में  मोटी रस्सी से चढ़कर उनके कमरे में आये।  यह रस्सी नहीं अपितु सर्प था ऐसा जान रत्नावली जी ने तुलसीदास जी से कहा “ये मेरा शरीर जो मांस और हड्डियों से बना है। जितना मोह आप मेरे साथ रख रहे हैं अगर उतना ध्यान भगवान राम पर देंगे तो आप संसार की मोह माया को छोड़ अमरता और शाश्वत आनंद प्राप्त करेंगे।" 


तुलसीदास जी का  आध्यात्मिक जीवन का मार्ग यहीं से प्रशस्त हुआ।  इसके उपरान्त  तुलसीदास जी घर छोड़कर तपस्वी बन गए। पति+नी (नी+क्विप्)=पतिनि शब्द का  अपभ्रंश है, पत्नी। नी का अर्थ है, पथ प्रदर्शक अग्रणी आगे- आगे चलने वाला।इसी प्रकार पतिनी का अर्थ है- पति को साथ लेकर धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति में उसके आगे आगे चलने वाली स्त्री। वास्तव में रत्नावली जी के जिह्वा पर सरस्वती का वास था।  हमारे दर्शन में हर स्त्री में शक्ति (देवी) भाव को देखा गया है।  देवी ही माया हैं वही भ्रान्ति भी हैं और वही बुद्धि है और ज्ञान रुपी शान्ति भी हैं : 


या देवी सर्वभूतेषु माया रूपेण संस्थिता।

या देवी सर्वभूतेषु भ्रान्ति रूपेण संस्थिता।

या देवी सर्वभूतेषु शांति रूपेण संस्थिता।

या देवी सर्वभूतेषु बुद्धि रूपेण संस्थिता।

  

वस्तुतः शक्ति सर्वत्र व्यापत हैं : 


इन्द्रियाणामधिष्ठात्री भूतानां चाखिलेषु या| भूतेषु सततं तस्यै व्याप्तिदेव्यै नमो नमः। 


कितनी अनोखी बात है , तुलसीदास जी ने वेदांग वेदांत सब पढ़ा, परन्तु रज्जु सर्प न्याय, उन्हें इस तरह ईश्वर करा देंगे यह बहुत विस्मयकारी है।ब्रह्म अनिर्वचनीय है , बुद्धि के परे हैं। 

इस दिन के उपरान्त तुलसीदास जी की दिशा केवल राम शरणागति ही हो गयी।  पर राम परात्पर ब्रह्म हैं , दयालु हैं| राम भक्तवत्सल हैं , शरणागत की रक्षा करने वाले हैं  |अपने भक्त तुलसीदास को दर्शन दिए भक्त का मान भी रखा, 


चित्रकूट के घाट पर, भइ सन्तन की भीर।

तुलसिदास चन्दन घिसें, तिलक देत रघुबीर॥